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लेसिथिन के 100 से अधिक वर्षों से एक लोकप्रिय प्राकृतिक उत्पाद बने रहने के 5 कारण

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लेसिथिन क्या है? 

लेसिथिन कई वनस्पति और पशु स्रोतों में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एक वसीय पदार्थ है। एक "प्रकार्यात्मक खाद्य पदार्थ" के रूप में लेसिथिन के उपयोग का प्रचार सबसे पहली बार 1907 में सोया लेसिथिन के रूप में किया गया था। हाल के दिनों में, जीएमओ प्रारूपों की बहुतायत और इसकी एलर्जी उत्पन्न करने की क्षमता के संबंध में सोया के प्रति सरोकार के कारण, सूरजमुखी से व्युत्पन्न लेसिथिन भी एक लोकप्रिय प्रकार बन गया है। लेसिथिन ग्रैन्यूल के रूप में उपलब्ध है लेकिन सॉफ्ट-जेल कैप्सूलों के रूप में भी प्राप्त किया जा सकता है। लेसिथिन के मुख्य घटक फॉस्फेटाइड नामक वसीय यौगिक हैं जिनमें से सबसे उल्लेखनीय फॉस्फेटिडाइलकोलीन है। यह यौगिक मानव कोशिका झिल्लियों का एक मुख्य संरचनात्मक कारक भी है और कोशिकीय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

बाज़ार में कई वर्षों से उपलब्ध लेसिथिन ने इस दौरान अपनी लोकप्रियता में काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। कई उपभोक्ताओं द्वारा अपने आहार पूरकों में समग्र खाद्य पदार्थों को शामिल करने के कारण, लेसिथिन की लोकप्रियता फिर से बढ़ने लगी है। यहाँ लेसिथिन के स्वास्थ्य के लिए 5 मुख्य लाभ दिए गए हैं।

लेसिथिन कोलीन का शानदार स्रोत है

हालांकि कोलीन का शरीर में निर्माण या तो अमीनो एसिड मेथायोनीन या सेरीन से किया जा सकता है, 1998 में इन्स्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन द्वारा इसे एक आवश्यक पोषक तत्व घोषित किया गया। कारण? यह पता चला है कि स्वस्थ लोगों में भी निर्मित इसकी मात्रा शरीर की जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है। 

कोलीन महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमिटर एसिटाइलकोलीन और कोशिका झिल्ली के संकेतक यौगिकों के निर्माण में भी योगदान करता है। यह फोलिक एसिड और विटामिन बी12 की तरह एक "मिथाइल डोनर" के रूप में भी काम करता है। यह वसाओं के यथोचित परिवहन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कोलीन के बिना, वसा पदार्थ यकृत की कोशिकाओं में फंस जाते हैं, जिसके कारण नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर रोग (NAFLD) नामक एक अवस्था उत्पन्न हो सकती है।  आहार से मिलने वाला फॉस्फेटिडाइलकोलीन कोलीन का मुख्य आहार स्रोत है और लेसिथिन फॉस्फेटिडाइलकोलीन का सबसे प्रचुर स्रोत है। 

कोलीन का अधिक सेवन मस्तिष्क के प्रकार्य को बढ़ा सकता है

कुछ अध्ययनों ने दर्शाया है कि कोलीन का अधिक सेवन करने से मानसिक प्रकार्य और याददाश्त में सुधार होता है। यह लाभ मस्तिष्क में एसिटाइलकोलीन नामक रसायन के स्तरों में वृद्धि का परिणाम होता है, जो याददाश्त और मस्तिष्क के प्रकार्य में बड़ी भूमिका निभाता है। आहार में फॉस्फेटिडाइलकोलीन का अनुपूरण करने से मस्तिष्क में एसिटाइलकोलीन के स्तरों की वृद्धि को अध्ययनों के द्वारा सिद्ध किया गया है। आरंभ में, अनुसंधानकर्ताओं ने सोचा कि इस वजह से फॉस्फेटिडाइलकोलीन अल्ज़ाइमर्स रोग में बहुत मददगार साबित हो सकता है। यह एक उचित अपेक्षा थी क्योंकि अल्ज़ाइमर्स रोग से ग्रस्त लोगों के मस्तिष्क में एसिटाइलकोलीन स्तरों का कम होना बहुत आम है। तथापि, अल्ज़ाइमर्स रोग में एसिटाइलकोलीन के स्तर ही एकमात्र समस्या नहीं हैं। यह पता चला है कि असली समस्या एंज़ाइम एसिटाइलकोलीन ट्रांसफरेज़ की गतिविधि में कमी है। यह एंज़ाइम (फॉस्फेटिडाइलकोलीन द्वारा प्रदत्त) कोलीन को एक एसिटाइल अणु के साथ संयोजित करके एसिटाइलकोलीन बनाता है। चूंकि अधिक कोलीन प्रदान करने से इस मुख्य एंज़ाइम की गतिविधि में वृद्धि नहीं होती है, फॉस्फेटिडाइलकोलीन के अनुपूरण के साथ किए गए अध्ययनों में अल्ज़ाइमर्स रोग के अधिकांश मरीज़ों में नहीं के बराबर लाभ ही देखा गया। फॉस्फेटिडाइलकोलीन को बहुत अधिक खुराकों (यानी, 25-30 ग्राम) में देकर ही लाभ मिलने की संभावनाओं को बढ़ाया जा सकता है। अच्छी खबर यह है कि यदि फॉस्फेटिडाइलकोलीन का अनुपूरण अल्ज़ाइमर्स रोग में उपयोगी होने वाला है तो ऐसे परिणाम उपयोग के पहले दो हफ्तों में ही स्पष्ट हो जाते हैं।

जबकि फॉस्फेटिडाइलकोलीन या लेसिथिन , संभव है कि अल्ज़ाइमर्स रोग के सभी मामलों में मस्तिष्क के प्रकार्य को बढ़ावा न दें, लगता है कि इनसे अधिकांश अन्य लोगों को मदद मिलती है। नॉर्वे में संचालित एक अध्ययन में, 70-74 वर्ष के 2,195 वयस्कों ने बुद्धिमत्ता और कोलीन के स्तरों के बीच शक्तिशाली संबंध प्रदर्शित किया। जिन लोगों के खून में कोलीन के स्तर कम थे उनमें कोलीन की अधिक मात्रा वाले लोगों से कम बुद्धिमत्ता और संज्ञान देखा गया। यह अध्ययन सुझाता है कि लेसिथिन या फॉस्फेटिडाइलकोलीन के जरिये कोलीन का अनुपूरण कोलीन के स्तरों को बढ़ा सकता है और इसके परिणामस्वरूप बुद्धिमत्ता में वृद्धि हो सकती है। 

मिलने वाले लाभ का संबंध खुराक से हो सकता है क्योंकि नैदानिक परीक्षणों के परिणामों ने मस्तिष्क के प्रकार्य को सुधारने में बहुत अच्छे परिणाम दर्शाए हैं, लेकिन कुछ अध्ययनों में परिणाम इतने प्रभावशाली नहीं थे। प्रत्येक व्यक्ति के आधाररेखा कोलीन स्तर भी एक कारक हो सकते हैं। यदि मस्तिष्क में कोलीन की मात्रा पर्याप्त है तो ही सकारात्मक लाभों के प्राप्त होने के बारे में सोचें। यदि किसी में इसकी मात्रा लगभग पर्याप्त है, तो वह कम खुराक के प्रति बहुत अच्छी प्रतिक्रिया दे सकता है जबकि जिस किसी को इसकी भारी कमी होती है उसे काफी अधिक खुराकों की जरूरत पड़ सकती है। इन नैदानिक अध्ययनों के परिणामों की विसंगति का मतलब हो सकता है कि खून और मस्तिष्क में कोलीन के एक विशेष स्तर पर पहुंचने के बाद ही लोगों में लाभ दिखाई दे सकते हैं। 

चूंकि कोलीन के स्तरों को सामान्य तौर पर जाँचा नहीं जाता है, और लेसिथिन की कीमत काफी कम है, लगभग 4 हफ्तों के लिए कोलीन के अनुपूरण को आजमाने से याददाश्त और संज्ञान से संबंधित चुनौतियों से लड़ने में मदद मिल सकती है। यदि कोई प्रभाव नज़र नहीं आता है, तो मैं और 4 हफ्तों के लिए खुराक को दोगुना करने की अनुशंसा करूँगा।

लेसिथिन और यकृत का स्वास्थ्य

जब यकृत क्षतिग्रस्त हो जाता है तो इसके कारण यकृत के भीतर वसा जमा होने लगता है। यह प्रक्रिया अल्कोहल के कारण हुई यकृत की क्षति के साथ हो सकती है, तथापि, नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर रोग (NAFLD) नामक एक नई महामारी भी सामने आई है। इसकी तीव्रता यकृत के प्रकार्य में मामूली सी कमी से लेकर यकृत के शोथ तक हो सकती है जिसे नॉन-अल्कोहलिक स्टीटोहेपैटाइटिस (NASH) कहते हैं, जो आगे चलकर सिर्रोसिस और अंततः यकृत की खराबी में बदल सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण वज़न की अधिकता है। जिन मरीज़ों का वज़न आदर्श शारीरिक वज़न से 10% अधिक है उनमें से 70% से अधिक को NAFLD होता है और मोटापे से ग्रस्त 100% लोगों में यह होता है।

कोलीन, खास तौर पर फॉस्फेटिडाइलकोलीन, यकृत से वसाओं के परिवहन के लिए आवश्यक है। यदि कोलीन के स्तर कम हैं, तो वसा यकृत में एकत्र हो जाता है जिसके कारण NAFLD होता है। कोलीन के स्तरों के कम होने से अधिक गंभीर यकृत समस्या, NASH के कारण होने वाली यकृत की सिर्रोसिस की प्रगति में नाटकीय वृद्धि होती है। नॉनअल्कोहलिक स्टीटोहेपैटाइटिस नैदानिक अनुसंधान नेटवर्क के 664 प्रयोगाधीन व्यक्तियों के एक विस्तृत अध्ययन में, उन रजोनिवृत्त महिलाओं को अधिक तीव्र फाइब्रोसिस हुई थी जो NASH से ग्रस्त थीं और जिनका कोलीन सेवन अनुशंसित पर्याप्त दैनिक सेवन के 50% से कम था।

स्पष्ट है कि, ये संबद्धताएं सुझाती हैं कि लेसिथिन या फॉस्फेटिडाइलकोलीन का अनुपूरण NAFLD और NASH दोनों में कुछ हद तक लाभदायक हो सकता है। एक पायलट अध्ययन ने यह प्रश्न उठाया है कि "अगर इसके इतने सारे संभावित लाभ हैं तो अधिक अनुसंधान क्यों नहीं किया जा रहा है?" यह अध्ययन 2001 में जर्नल ऑफ पारेंटरल एंड एंटरल न्यूट्रिशन में प्रकाशित हुआ था। इसमें NAFLD से ग्रस्त उन वयस्कों को शामिल किया गया था जो शिरा के माध्यम से भोजन प्राप्त कर रहे थे। इन मरीज़ों को हर रोज अतिरिक्त 2 ग्राम कोलीन खिलाने से प्रत्येक मरीज़ का NAFLD पूरी तरह से ठीक हो गया। 

निर्णायक अनुसंधान के अभाव के बावजूद, युनाइटेड स्टेट्स नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ हेल्थ भी स्वीकार करती है कि “उचित यकृत प्रकार्य और NAFLD के निवारण के लिए कोलीन के पर्याप्त मात्रा में सेवन की जरूरत है।”

लेसिथिन और कोलेस्ट्रॉल

शायद सबसे आम कारण जिसके लिए कई लोग लेसिथिन लेते हैं, वह है हृदय रोग का निवारण करने की दृष्टि से कोलेस्ट्रॉल के स्तरों को कम करने में मदद करना। इस उपयोग के समर्थन में कुछ नैदानिक प्रमाण उपलब्ध हैं। हालांकि 50 से अधिक वर्ष पहले किए गए कुछ लघु अध्ययनों में काफी प्रभावशाली परिणाम दर्शाए गए थे, उसके बाद इस पर बहुत कम अनुसंधान किया गया है। जो कुछ प्रमाण उपलब्ध हैं वे भी बहुत सकारात्मक प्रभाव दर्शाते हैं। 1 से लेकर 12 महीनों की अवधि में लेसिथिन से उपचार वाले कुल 15 अध्ययनों में, कुल सीरम कोलेस्ट्रॉल में 8.8% से 28.2% की कमी हुई, ट्राइग्लिसराइड के स्तरों में 25% की कमी हुई, और एचडीएल कोलेस्ट्रॉल के स्तरों में 13.4% से 20% की वृद्धि हुई। इन अध्ययनों में आम खुराक 1.5 से 2.7 ग्राम रोज़ाना थी।

सबसे हाल में 2010 में मेडिकल जर्नल कोलेस्ट्रॉल में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। इस अध्ययन में, उच्च कोलेस्ट्रॉल स्तरों वाले 30 मरीज़ों को 2 महीनों के लिए फॉस्फेटिडाइलकोलीन की अधिक मात्रा वाले सोया लेसिथिन की 500 मिग्रा की खुराक रोज़ाना दी गई। इस पूरक ने कुल कोलेस्ट्रॉल स्तरों और एलडीएल कोलेस्ट्रॉल स्तरों में क्रमशः 42% और 56% की कमी की। ये प्रभावशाली परिणाम हैं जिनके कारण आगे और अध्ययन करने के लिए प्रेरणा मिल सकती है। यदि ये परिणाम कायम रहते हैं, तो उच्च कोलेस्ट्रॉल स्तरों के प्रति एक सुरक्षित और कारगर प्राकृतिक दृष्टिकोण के रूप में लेसिथिन की लोकप्रियता फिर से बढ़ने की संभावना है।

लेसिथिन फॉस्फेटिडाइलकोलीन से अधिक प्रदान करता है

जबकि फॉस्फेटिडाइलकोलीन लेसिथिन का प्रमुख घटक है, अन्य मूल्यवान यौगिक भी हैं जिनमें फॉस्फेटिडाइलसेरीन जैसे अन्य फॉस्फेटाइड शामिल हैं, जो एक और मुख्य मस्तिष्क यौगिक है जिसे नैदानिक अध्ययनें में तनाव में कमी, मनोदशा में वृद्धि, और याददाश्त में सुधार करते दर्शाया गया है। लेसिथिन के फॉस्फेटिडाइलइथैनॉलएमाइन, खास तौर पर, यकृत में शोथ को कम करने वाले उनके प्रभावों के लिए खास तौर पर दिलचस्पी पैदा करते हैं। यहाँ सोया या सूरजमुखी से व्युत्पन्न लेसिथिन की सामान्य प्रोफाइल दी गई है, लेकिन कृपया ध्यान रखें कि इन घटकों के कई अलग-अलग मात्राएं बाज़ार में उपलब्ध हैं:

सोया लेसिथिन:

  • 23% फॉस्फेटिडाइलकोलीन
  • 14% फॉस्फेटिडाइलइथैनॉलएमाइन
  • 14% फॉस्फेटिडाइलइनॉसिटॉल
  • 5–10% अन्य फॉस्फेटाइड
  • 2–5% स्टेरॉल

सूरजमुखी का लेसिथिन:

  • 25% फॉस्फेटिडाइलकोलीन
  • 18% फॉस्फेटिडाइलइथैनॉलएमाइन
  • 11% फॉस्फेटिडाइलइनॉसिटॉल
  • 5-10% अन्य फॉस्फेटाइड
  • 2-5% स्टेरॉल

लेसिथिन: किस चीज की तलाश करें और खुराक संबंधी अनुशंसाएं 

आपको लेसिथिन को किस प्रारूप और कितनी मात्रा में लेना चाहिए? सबसे पहले, सोया बनाम सूरजमुखी। एक व्यावहारिक दृष्टिकोण से, जैसे कि आप ऊपर देख सकते हैं, उनमें बहुत समानता है, हालांकि सूरजमुखी का लेसिथिन एक अपेक्षाकृत नया प्रारूप है, इसके पीछे कोई वास्तविक अनुसंधान नहीं है। इसलिए, इस बात की हमेशा संभावना है कि सोया लेसिथिन में कोई चीज है जो ऐसे कुछ लाभ पैदा करती है जो सूरजमुखी के लेसिथिन में नहीं हैं। सूरजमुखी के लेसिथिन को विकसित करने का कारण सोया के जीएमओ पहलुओं से दूर रहना और यह तथ्य था कि सोया एक आम एलर्जन है। फिर भी, यदि किसी व्यक्ति को सोया से कोई समस्या नहीं है और उत्पाद को गैर-जीएमओ प्रमाणित किया गया है, तो सोया बिल्कुल बढ़िया है।

लेसिथिन ग्रैन्यूल और सॉफ्ट जिलेटिन कैप्सूलों के रूप में उपलब्ध है। फॉस्फेटिडाइलकोलीन या कुल फॉस्फेटाइड की मात्रा उल्लेखनीय रूप से भिन्न हो सकती है। कुछ ऐसे उत्पाद भी उपलब्ध हैं जिनमें फॉस्फेटिडाइलकोलीन या कुल फॉस्फेटाइड की मात्रा को बढ़ाने के लिए तेलों (लिनोलीक एसिड और लिनोलेनिक एसिड) को निकाल दिया जाता है। इसलिए, उत्पादों की तुलना करते समय लेबलों को सावधानी से पढ़ें और फॉस्फेटाइड की घोषित मात्रा पर ध्यान दें।

जहाँ तक खुराक का सवाल है, कोलेस्ट्रॉल कम करने या यकृत के स्वास्थ्य का समर्थन करने वाले फॉस्फेटाइड की अधिक मात्रा (35 से 68%) वाले उत्पादों में प्रयुक्त खुराक की सामान्य रेंज 500 से 1,500 मिग्रा रोज़ाना है। इस खुराक की स्तर पर आम तौर पर कैप्सूलों का उपयोग किया जाता है। मस्तिष्क के स्वास्थ्य और समग्र स्वास्थ्य को बढ़ाने के लिए, लेसिथिन ग्रैन्यूल का उपयोग आम तौर पर रोज़ाना एक पूरे भरे बड़ा चम्मच के रूप में किया जाता है जो कि 10 ग्राम जितना हो सकता है और लगभग 5,000 मिग्रा (या तेल-मुक्त संस्करण का उपयोग कर रहे हैं तो उससे अधिक) रोज़ाना का कुल फॉस्फेटाइड स्तर प्रदान करता है। 

लेसिथिन को आम तौर पर सुरक्षित माना जाता है और इसके कोई उल्लेखनीय दुष्प्रभाव नहीं हैं। अधिक खुराकों (यानी, 10 ग्राम से अधिक) में लेने पर, लेसिथिन के उत्पाद भूख में कमी, मतली, पेट फूलने, जठरांत्रीय दर्द और दस्त जैसे लक्षण पैदा कर सकते हैं।

इसकी कोई ज्ञात औषधीय परस्पर क्रियाएं नहीं हैं और लेसिथिन गर्भावस्था और दुग्धस्राव के दौरान सुरक्षित है। बच्चे भी लेसिथिन का उपयोग कर सकते हैं, बस खुराक को वयस्कों की खुराक के आधे से कम कर दें।

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