माइंडफुलनेस या चेतना बढ़ाने वाले 8 कुदरती सप्लीमेंट
चेतना क्या है?
शोध में, चेतना को अक्सर मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक सेहत पर सकारात्मक प्रभाव के साथ जोड़ा गया है। इसे एक ऐसी मानसिक अवस्था के तौर पर परिभाषित किया जाता है जो जागरूकता को वर्तमान में केन्द्रित या स्थित करती है। अक्सर चेतना अपने विचारों, भावनाओं, और बिना कोई राय बनाए अपने एहसासों के बारे में जागरूक होने के साथ आती है।
मूल रूप से बौद्ध आस्था से जुड़े होने की वजह से हजारों सालों से चेतना का अभ्यास किया जाता रहा है। पश्चिमी गोलार्ध में, 1970 के दशक से चेतना को जॉन कैबेट-ज़िन के साथ जोड़कर देखा जाता है। कैबेट-ज़िन ने चिकित्सकों को पुराने दर्द से जूझ रहे रोगियों को उनके पास भेजने के लिए बढ़ावा दिया। उन्होंने “चेतना-आधारित तनाव मुक्ति” नामक अवधारणा की रचना की और पाया कि उनकी तकनीक कई अलग-अलग तरह की बीमारियों को ठीक करने में कामयाब है।
चेतना की ए बी सी
“चेतना की ए बी सी” के जरिये चेतना जागृति के बारे में सीखने को आसानी से समझाया जा सकता है। ‘ए’ का मतलब है ‘अवेयरनेस’ यानी जागरूकता। आमतौर पर इस तकनीक को सीखने की शुरूआत शरीर के स्कैन से होती है। शरीर को स्कैन करना सीखते वक़्त, हो सकता है कि चेतना के विद्यार्थियों को अपनी टाँगों, और फिर अपने पैरों, वगैरह पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए कहा जाए। जब उनका मन इधर-उधर की बातों से भटकने लगता है, तो उन्हें वापस अपने शरीर के बारे में सोचने के लिए कहा जाता है। इससे मन को वर्तमान में रहने का अभ्यास करवाने में मदद मिलती है।
‘बी’ का मतलब है ‘बीइंग प्रेज़ेंट’ यानी वर्तमान में रहना। अक्सर, कुदरती तौर पर हमारी प्रतिक्रिया किसी अनचाहे अनुभव या अनचाही भावना से बचने की होती है। यह सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया हमें उस स्थिति से बचने में मदद करती है जिससे हम निपटना नहीं चाहते। किसी अनुभव या भावना के साथ वर्तमान में रहकर, हम किसी असहज स्थिति को स्वीकार करने और उसे होने देने का अभ्यास करते हैं।
और आख़िर में, ‘सी’ का मतलब है ‘चॉइस’ यानी चुनाव। अपने मन के भटकाव के बारे में जागरूक रहकर और इसे वर्तमान में रहने का अभ्यास करवाकर, हम वर्तमान में रहना चुन सकते हैं। मुश्किल भावनाओं या फैसलों से आमना-सामना होने पर ये पहले दो कदम हमें बेहतर चुनाव करने में मदद करते हैं।
अवसाद की मनोदशा और चिंता के लक्षणों की चिकित्सा में चेतना का इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति और उसके उन विचारों और भावनाओं के बीच के रिश्ते को बदला जा सकता है, जो लक्ष्यों को हासिल करने या ज़िंदगी में आगे बढ़ने में रूकावट बन रहे हों।
चेतना का अभ्यास न करने से क्या हो सकता है?
अवसाद और बेचैनी के लक्षणों पर चेतना के प्रभावों को जानने के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि चेतना का अभ्यास करने से इन लक्षणों में कमी आती है। यह पाया गया कि भावनाओं को दबाना, पुन: मूल्यांकन, चिंता और ज़रूरत से ज़्यादा चिंतन-मनन अवसाद और बेचैनी के लक्षणों को बढ़ावा दे रहे थे।
भावनाओं को दबाने को बहुत पहले से खराब सेहत से जोड़ा जाता रहा है। यह कुछ इस प्रकार है कि जैसे नकारात्मक भावनाओं से ना निपटने या उन्हें ना अपनाने से शरीर को नुकसान पहुंच सकता है। भावनात्मक पुन: मूल्यांकन को आमतौर पर रीफ़्रेमिंग कहा जाता है यानी किसी चीज़ को नए नज़रिए से देखना ताकि नकारात्मक भाव न आएं।
एक आम उदाहरण है कि जब ट्रैफ़िक में कोई आपक़ा रास्ता काट दे। हो सकता है आप सोचें कि वह शख्स घमंडी और अकड़ू है; शायद आप उस ड्राइवर पर चिल्ला भी पड़ें। अगर आप स्थिति का अलग नज़रिए से देखते हैं और सोचते हैं कि "वह शख्स ज़रूर बेचैन और परेशान होगा, इसलिए उसने ध्यान नहीं दिया। मेरे साथ भी ऐसा होता है।“ फिर आप नाराज़ नहीं होते। इस अलग नज़रिए से आपमें नकारात्मक भावना नहीं आती और उस भावना के साथ आने वाला तनाव नहीं होता।
खतरे की प्रतिक्रिया में हम चिंता करते हैं, जबकि नुकसान और नाकामयाबी की फ़िक्र में हम चिंतन-मनन करते हैं। अध्ययनों से पता चला है कि चिंता का संबंध बेचैनी के लक्षणों और प्रबल भावनाओं को ना संभाल पाने से हो सकता है। दूसरी तरफ़, चिंतन-मनन को अवसाद के लक्षणों से जोड़ा जाता है और इसका मतलब होता है बुरे नतीजों के बारे में बार-बार सोचना।
चेतना के अभ्यास के बिना, हम अवसाद और बेचैनी के लक्षणों के इन सौदागरों के चंगुल में आसानी से फंस सकते हैं।
चेतना बढ़ाने के लिए मैं अपनी जीवन शैली में क्या बदलाव कर सकता हूँ?
अध्ययनों में पाया गया है कि चेतना को बढ़ाने में योग, व्यायाम, और ताई ची जैसी शारीरिक गतिविधियाँ मददगार साबित होती हैं। इन गतिविधियों और बेचैनी के लक्षणों में कमी के बीच एक सकारात्मक संबंध देखा गया है।
कैफ़ीन, शराब और निकोटीन का परहेज़ करने के भी ऐसे ही फ़ायदे दिखाई दिए हैं। अपने आहार में उच्च प्रति-ग्राम-पोषक-तत्व वाले खाद्य पदार्थों को ज़्यादा शामिल करके और डाइटरी सप्लीमेंट इस्तेमाल करके भी चेतना को बढ़ाया जा सकता है।
चेतना बढ़ाने के लिए 8 कुदरती सप्लीमेंट
कई सप्लीमेंट चेतना को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं, जिनमें एल-थियेनाइन, अश्वगंधा, ब्लूबेरी एक्सट्रेक्ट, GABA, रोडियोला, फॉस्फेटाइडिलसरीन, गिन्को बिलोबा, और ब्राह्मी शामिल हैं।
एल-थियेनाइन और तनाव में कमी
एल-थियेनाइन ग्रीन टी में पाया जाने वाला एक अमीनो एसिड है। यह कंपाउंड बचाव में मददगार हो सकता है, क्योंकि यह एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर होता है। यह हमारे सोचने के तरीके पर तनाव के प्रभाव को कम कर सकता है और बेचैनी के लक्षणों को भी घटा सकता है।
एल-थियेनाइन को लंबे वक़्त तक ध्यान केन्द्रित करने में मदद करने वाले कंपाउंड के तौर पर भी जाना जाता है, और यह निद्रा-चक्र को स्वस्थ रखने में भी मदद कर सकता है।
अश्वगंधा और बेचैनी में सहायता
अश्वगंधा, जिसे इसके लैटिन नाम विथानिया सोम्निफ़ेरा के नाम से भी जाना जाता है, एडैप्टोजेन की श्रेणी में आने वाली एक जानी-मानी जड़ी-बूटी है।
एडैप्टोजेनिक जड़ी-बूटियाँ शरीर में कोर्टिसोल, यानी हमारे तनाव हार्मोन, के स्तर को सही रखने में मदद करती हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि अश्वगंधा तनाव और बेचैनी के लक्षणों से निपटने में मदद करता है। यह सूजन-जलन पर स्वस्थ प्रतिक्रिया में भी मदद कर सकता है और इसमें एंटीऑक्सिडेंट गुण होते हैं।
ब्लूबेरी एक्सट्रैक्ट का न्यूरोप्रोटेक्टिव प्रभाव
ब्लूबेरी के एक्सट्रैक्ट की न्यूरोप्रोटेक्टिव खूबियों पर लंबे समय तक अध्ययन किया गया है। वैक्सीनियम एंगस्टिफोलियम, या जंगली ब्लूबेरी एक्सट्रैक्ट, पॉलीफेनोल्स जैसे एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर होता है।
ब्लूबेरी में पाए जाने वाले एंटीऑक्सिडेंट बेचैनी या अवसाद के लक्षणों की वजह से आने वाली हानिकारक स्तर की सूजन से हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को नुकसान होने से रोक सकते हैं। माना जाता है कि ये एक्सट्रैक्ट सीखने और याददाश्त बढ़ाने में मदद करते हैं।
शांति पाने में GABA की भूमिका
गामा-अमीनोब्यूटायरेट एसिड (GABA) शांति देने वाले न्यूरोट्रांसमीटर के तौर पर काम करने वाला एक अमीनो एसिड है। ऐसा मन जाता है कि यह कंपाउंड दिमाग के एमीगडाला नामक हिस्से पर असर करता है, जो भावना और व्यवहार में भूमिका निभाता है।
माना जाता है कि बहुत सारे उत्तेजक न्यूरोट्रांसमीटर के निकलने से या इन न्यूरोट्रांसमीटर के प्रति अधिक संवेदनशीलता से बेचैनी के लक्षण उभर सकते हैं। GABA दिमाग में इन उत्तेजक कंपाउंड को संतुलित करने और शांति का एहसास दिलाने में मदद कर सकता है।
रोडियोला बढ़ाए याददाश्त
रोडियोला या रोडियोला रोसिया, अश्वगंधा जैसी एक एडैप्टोजेनिक जड़ी-बूटी है, लेकिन इसमें खुद के अनूठे गुण हैं।
अध्ययन में पाया गया है कि यह जड़ी-बूटी याददाश्त और सीखने को बढ़ावा देती है और बेचैनी के लक्षणों को कम कर सकती है। यह भी माना जाता है कि यह एकाग्रता बढ़ाने, मानसिक थकान को कम करने में मदद कर सकती है, और इसके एंटीऑक्सिडेंट गुण महत्वपूर्ण तंत्रिका टिशू को नुकसान से बचा सकते हैं।
फॉस्फेटाइडिलसेरिन और न्यूरॉन का निर्माण
फॉस्फेटाइडिलसेरिन एक आवश्यक फॉस्फोलिपिड या वसा है जो न्यूरॉन या मस्तिष्क कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है। यह कंपाउंड दिमाग में सबसे प्रचुर मात्रा में मौजूद वसा है।
फॉस्फेटाइडिलसेरिन में कमी को ज़्यादा देर तक ध्यान केन्द्रित ना कर पाने, सीखने और संज्ञानात्मक क्रिया में कमी के साथ जोड़ा जाता है। शरीर इस वसा के महत्व को समझता है, इसलिए इसके निर्माण पर कड़ा नियंत्रण होता है ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि दिमाग के सही तरह के काम करने के लिए इसकी पर्याप्त मात्रा मौजूद है।
गिन्को और रक्त प्रवाह
गिन्को, या गिन्को बिलोबा, मेडेनहेयर पेड़ का अर्क है, जो मूलतः एशिया का है। यह पौधा एंटीऑक्सीडेंट गुणों से युक्त फ्लेवोनोइड्स से भरपूर होता है।
शोध बताता है कि गिन्को का अर्क दिमाग में रक्त प्रवाह को बढ़ावा देकर सीखने-समझने में मदद कर सकता है। फ्लेवोनोइड दिमाग के टिशूज़ को नुकसान से बचा सकते हैं और न्यूरोट्रांसमीटर के निर्माण स्तर को स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं।
ब्राह्मी और स्वस्थ संज्ञान
ब्राह्मी, या बकोपा मोंनिरी, मूलतः भारत और एशिया के कुछ हिस्सों से आया है। यह संज्ञान, याददाश्त को स्वस्थ रखने, और सीखने में मदद कर सकता है। बेचैनी के लक्षणों को कम करने में भी ब्राह्मी अहम भूमिका निभा सकता है।
इसके एंटीऑक्सिडेंट गुणों की वजह से इसमें सूजन-जलन पर स्वस्थ प्रतिक्रिया देने की क्षमता होती है।
ऐसा लगता है कि हमारे जीवन में नकारात्मक विचारों व घटनाओं के प्रभाव को कम करने के लिए चेतना एक अच्छा उपाय है। शुक्र है कि इस प्रक्रिया में मदद करने के लिए जीवन शैली और सप्लीमेंट से जुड़े सुझाव मौजूद हैं।
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